जंतर मंतर जहाँ तमिलनाडु के किसानों का नग्न प्रदर्शन भी व्यवस्था की नजर में अपराध बन गया था और कॉकरोच जनता पार्टी…?

Uncategorized

हाल ही में CJI द्वारा बेरोजगारों को कॉकरोच कहने की प्रतिक्रिया स्वरूप सोशल मीडिया पर बनी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का 6 जून को दिल्ली के जंतर-मन्तर पर प्रदर्शन हुआ. उसके आयोजकों को लेकर विपक्षी पार्टीयों की राय भी अस्पष्ट ही रही लेकिन देश की न्याय व्यवस्था के सर्वोतम शिखर पर बैठे व्यक्ति के गैर-जिम्मेदाराना और अनैतिक बयानों की प्रतिक्रिया स्वरूप देश का युवा चाहे ऑनलाइन ही एक हुआ हो, कम से कम विरोध में तो बोला. CJP के सम्बन्ध में हिंदी क्षेत्र के आलोचकों ने क्या-क्या प्रतिक्रिया दी है…नीचे पढिए.

वैभव सिंह

काक्रोच जनता पार्टी एक अराजक हो चुके सिस्टम के खिलाफ़ अराजक प्रतिक्रिया है। इस आंदोलन के सफल होने की खास उम्मीद नहीं है। स्वाभाविक है कि यह सिस्टम की मजबूत चट्टान के आगे धराशायी हो जाएगा, या पूरी तरह उसका ही अंग बन जाएगा। पर देश में बढ़ते चौतरफा नियंत्रण, संस्थाओं पर आरएसएस के मलिन कब्जे और सेंसरशिप को चुनौती देकर यह युवाओं को भविष्य के किसी अधिक बड़े मूवमेंट की तैयारी की प्रेरणा भी दे सकता है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतःस्फूर्त किस्म की डिजिटल एकजुटता को जमीनी यथार्थ में बदलने का काम पिछले एक दशक में भाजपा-संघ ने बखूबी किया है। संभव है कि उसका विरोध भी इसी प्रक्रिया से निकलकर सामने आएगा।

उमाशंकर सिंह परमार

भारत मे कोई भी आन्दोलन हो कितनी भी सावधानी रखी जाये शुरूआत मे ही किसी न किसी असफल , राजनीति से चुके हुए , झूठे नैरेटिवबाज़ पेशेवर हैकरों द्वारा हाईजैक कर लिया जाता है फिर चलता है, घिसटता है फिर लुढकता है, अन्त मे बिना किसी उम्मीद के पिटता है ।

अन्ना आन्दोलन मेरी स्मृति मे सबसे बडा जनान्दोलन था अन्नाटीम ने शुरुआत मे सावधानी रखी लेकिन अन्ततः हाईजैक होकर पिट गया अब कोई जनलोकपाल, राईट टू रिकाल की माँग नही करता है ।

काक्रोच आन्दोलन का यह पहला प्रदर्शन था मगर यह भी हाईजैक हो गया बदनाम नारे, बदनाम लोग, बदनाम पेड मीडिया ने और नेताओं ने इसकी दिशा और दशा तय कर दी । जो कुछ कमी रही मीडिया बाईट मे बोलते टुकडे-टुकडे गैंग के टुकडाखोर लोगों की बयानबाजी ने पूरी कर दी ।

पहला जमवाडा था बहुत से लोग मात्र तमाशा देखने गये थे। आन्दोलनकारियों से ज्यादा पुलिस की उपस्थिति रही ,और उनसे थोडा कम मीडिया की उपस्थिति रही ।

आशुतोष कुमार

अगर किसी को लगता है कि हज़ारों युवाओं का जंतर मंतर पर जुटना सी. आई. ए. या आर. एस. एस. की साजिश है, तो वह जरूर यह सोचता होगा कि भारत के युवा दुख और आक्रोश से ऊपर उठ चुके हैं।

सोचता होगा कि करोड़ों नौजवानों की जवानी को लील रही बेरोजगारी से उन्हें कोई कष्ट नहीं है। पेपर लीक से कोई परेशानी नहीं है। रिश्वत के बदले नौकरी परियोजना से वे प्रसन्न हैं। हिंदू मुसलमान की बकवास उनके हर दुख की दवा है। वे इतनी गर्मी और धूप में, बिना किसी साजिश के, सड़क पर आ ही नहीं सकते।

अगर किसी को लगता है कि कॉक्रोच प्रोटेस्ट से फासीवाद समाप्त हो जाएगा और पूरे देश में क्रांति फैल जाएगी तो जरूर वह सोचता होगा कि क्रांति बस सर्वोच्च न्याय- देवता के ऐतिहासिक बयान का इंतज़ार कर रही थी! आपको कुछ नहीं करना है। बस तमाशा देखना है और एक्सपर्ट कमेंट झोंकते रहना है।

अगर आप इन दो श्रेणियों में नहीं हैं, आपको लगता है कि नौजवानों का गुस्सा वास्तविक और जेनुइन है, तो आप उनके बीच जाएंगे और उस आक्रोश को एक राजनीतिक दिशा देने की कोशिश करेंगे। आइसा और दूसरे वाम संगठनों के युवा साथी यही कर रहे हैं। ठीक कर रहे हैं। पसीना बहाने का समय है, बहा रहे हैं। बिना लड़े हार जाने से लड़ कर हार जाना अच्छा है, अगर हारना ही है।

अगर दमन नहीं हुआ तो इसका मतलब यह मत लगाइए कि मिलीभगत है। सरकार अपना अच्छा बुरा समझती है। कल दमन हो जाता तो आज देश भर में जंतर मंतर खड़े हो जाते। अभी सुरक्षित दूरी पर रहना सरकार के लिए भी सबसे अधिक सुरक्षित है। दमन के लिए वह भी कॉकरोचों की किसी गलती का इंतजार करेगी।

वैसे कॉक्रोच भी सतर्क हैं। आंबेडकर, गाँधी और भगत सिंह को कलेजे से लगाए खड़े हैं। अगर वे इसी तरह फूलों और कविताओं के साथ शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ते रहे तो कम से कम हिंदू मुसलमान की राजनीति तो ख़त्म कर देंगे। इतना भी हो जाए तो बहुत बड़ा बदलाव हो जाएगा।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

यह वही जंतर-मंतर है, जहाँ शांतिपूर्ण विरोध के लिए पहुँचे तमिलनाडु के किसानों का नग्न प्रदर्शन भी व्यवस्था की नजर में अपराध बन गया था। महीनों तक चले उनके आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया गया। यही वह जंतर-मंतर है जहाँ देश की शीर्ष महिला पहलवानों को सड़क पर घसीटा गया, हिरासत में लिया गया और उन पर मुकदमे दर्ज हुए। यही वह जगह है जहाँ किसानों को पहुँचने से रोका गया, छात्रों और पुरानी पेंशन की माँग करने वाले कर्मचारियों के आंदोलनों पर कड़ी निगरानी रखी गई।

लेकिन यही जंतर-मंतर तब सहज उपलब्ध हो जाता है जब कोई स्वयंभू ‘मसीहा’ विदेश से दिल्ली पहुँचकर कुछ ही घंटों में पुलिस सुरक्षा और प्रशासनिक अनुमति के साथ मंच पर खड़ा हो जाता है और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर आगे रखकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग करता है।

बाबा साहब की तस्वीर लगाने मात्र से कोई व्यक्ति या संगठन उनकी विचारधारा का प्रतिनिधि नहीं बन जाता। बाबा साहब का नाम लेना और उनके सामाजिक न्याय, समानता, वैज्ञानिक सोच तथा लोकतांत्रिक संघर्ष के मूल्यों को आत्मसात करना दो अलग बातें हैं।

छात्रों का आक्रोश केवल परीक्षा घोटालों या नीट जैसी घटनाओं तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता के विरुद्ध भी है जो युवाओं, बेरोजगारों और असहमति रखने वालों को अपमानित करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल किसी मंत्री के इस्तीफे की माँग से यह संघर्ष समाप्त हो जाएगा? क्या इससे युवाओं की बेरोजगारी दूर हो जाएगी? क्या इससे शिक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक समस्याएँ खत्म हो जाएँगी? क्या इससे सांप्रदायिक नफरत, हिंसा, दमन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हो रहे हमले रुक जाएँगे?

इतिहास बताता है कि लोकतांत्रिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति, एक चेहरे या एक दिन के कार्यक्रम से नहीं आते। वे व्यापक सामाजिक भागीदारी, संगठन, विचार और दीर्घकालिक संघर्ष से आते हैं। किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके संगठन, उसकी सामूहिक नेतृत्व क्षमता और उसके स्पष्ट सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम में होती है, न कि किसी एक व्यक्ति की लोकप्रियता में।

बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा व्यक्ति-पूजा की नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक संगठन और समान अधिकारों की विचारधारा है। यदि कोई आंदोलन सचमुच उनके विचारों का सम्मान करना चाहता है, तो उसे समाज के हर वंचित, पीड़ित, छात्र, किसान, मजदूर, मुसलमान, सिक्ख और बेरोजगार युवा को साथ लेकर चलना होगा। अन्यथा यह अन्ना हजारे आंदोलन का बी पार्ट साबित होगा।

लोकतंत्र को बचाने का रास्ता रातों-रात नायक गढ़ने में नहीं, बल्कि संगठित जनसंघर्ष और व्यापक सामाजिक एकजुटता में है।

2 thoughts on “जंतर मंतर जहाँ तमिलनाडु के किसानों का नग्न प्रदर्शन भी व्यवस्था की नजर में अपराध बन गया था और कॉकरोच जनता पार्टी…?

  1. ऐसे आंदोलन होते रहते है… कुछ समय बाद सब शांत हो जाते है… ऐसे ही आंदोलन से आप पार्टी भी बनी थी

  2. सिर्फ सरकारी नौकरी के भरोसे जीवन न बनाएं नए कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *