अनशन करके सरकारों को झुकाना सौ साल पुराना तरीका है

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सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके को किसान आंदोलन का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। ज़ब तक कोई आंदोलन ‘अस्तित्व’ और ‘प्राण’ बचाने की प्रेरणा से सम्पन्न नहीं होता, तब तक वह या तो साजिश का हिस्सा हो सकता है या फिर सरल मूर्खता

अगर सोनम वांगचुक मर भी गए तो क्या भारत की जनता दिल्ली की ओर कूच करेगी? ऐसा नहीं भी हो तो अगले चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर कर देगी? ऐसा सोचना भी हास्यास्पद है। सबसे दुःखद यह है कि कुछ भाजपा समर्थित और कुछ ‘भयानक लोग’ सोनम वांगचुक के मरने की कामना कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है। लाखों में है। ये लोग बिना तनख्वाह के वैचारिक गुलाम हैं।

सोनम राजनेता नहीं है। ओमी वैद्य की भाषा में सोनम वांग चुक ‘रोचक ‘ हो सकते हैं, राजनेता नहीं। गाँधी से तुलना व्यर्थ हैं। गाँधी मंजे हुए और सम्पन्न राजनेता थे। उनकी सरकारों के साथ उठ-बैठ थी। शक्ति केंद्रों के प्रति उनकी समझ स्पष्ट थी। एक तरह से गाँधी का अनशन ‘स्पष्ट जिद’ पर आधारित होता था। गाँधी के समय अनशन आन्दोलन जगत में नया प्रयोग था। शक्ति केंद्रों को किसी के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मरने वाले व्यक्ति से प्रभाव पड़ता है। गाँधी के बड़े-बड़े शहरों में बड़े-बड़े अनुयायी थे, जो अंग्रेजी सरकार को प्रभावित करने की ताकत रखते थे।

आज सोनम वांगचुक जिस धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँग रहे हैं, उन्हीं का कुछ दिन पहले नयी शिक्षा प्रणाली पर समर्थन करके धन्यवाद कर रहे थे। अगर वे स्वयं को शिक्षाविद् और वैज्ञानिक सोच वाला कहते हैं और दुनिया उनको मानती है तो ‘पेपर लीक’ जैसे मुद्दे पर उनका अनशन पर बैठना अप्रासंगिक है क्योंकि CJP की टीम के पास कोई रोडमेप नहीं है। वे स्वयं को CJP के बैनर तले मूल्यहीन ही साबित कर रहे हैं। CJP का ऑनलाइन व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक आंदोलन भविष्य में होने वाले आंदोलनों की भूमिका थी। हो सकता है आगे जाकर बड़ा रूप ले लेता?अगर अभिजीत दिपके और उसके साथियों में ईमानदारी है भी तो उनके पास आंदोलन का कोई ‘प्लान’ नहीं होने के कारण दिल्ली में ‘जंतर-मंतर’ पर भीड़ जुटाना उनके लिए असंभव है क्योंकि ‘अन्ना आंदोलन’ ने कुछ समझदार और आशावादी लोगों के विश्वास को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया।

भारत की मध्यमवर्गीय जनता को आंदोलन करना फिलहाल नहीं आता। न उनकी वैचारिक समझ स्पष्ट है और न ही वे आंदोलन करके व्यवस्था बदलने जैसे ख्वाब देखते हैं। अंग्रेजी शासन से मुक्ति का आंदोलन इतिहास लेखन की चालाकी है जिसको ‘आजादी का आंदोलन’ कहा गया है। जिसे आंदोलन कहकर पाठ्य क्रमों में पढ़ाया जाता है और संविधान कहकर ‘न्याय-न्याय’ की गुहार लगाई जाती है, उसमें अधिकांश जनसंख्या का कोई योगदान और भागीदारी नहीं थी। यही कारण है कि आज सोनम वांगचुक जनता को यह बात समझाने में असफल हैं कि वे उन्हीं के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं।

जिन लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान दी वे पढ़े लिखें और ‘व्यवस्था का मतलब’ समझने वाले लोग थे। गाँधी, भगतसिंह, आंबेडकर, नेहरू इत्यादि राजनेता पहले थे, आंदोलनकारी बाद में। अनशन करके सरकारों को झुकाना सौ साल पुराना तरीका है। अन्ना आंदोलन प्रायोजित और ‘मीडिया मैंनेजमेंट’ था। सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके को किसान आंदोलन का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। सत्ताओं का चरित्र बदल गया लेकिन आंदोलन अभी भी उसी घिसे-पीटे तरीके से हो रहे हैं। ज़ब तक कोई आंदोलन ‘अस्तित्व’ और ‘प्राण’ बचाने की प्रेरणा से सम्पन्न नहीं होता तब तक वह या तो साजिश का हिस्सा हो सकता है या फिर सरल मूर्खता।

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