घाघरे में जूँ पड़ जाए तो घाघरा नहीं फेंकते : क्या सच में खेती घाटे का सौदा है ?

महेंद्र सिंह भारतीय पुलिस सेवा से निवृत किसान व्यवसायी हैं । वर्तमान में पश्चिमी बंगाल में रहकर खेती करते हैं और सोशल मीडिया पर खेती, खानपान तथा समसामयिक मुद्दों पर खुलकर लिखते हैं । यहाँ आप प्रशनोंत्तर शैली में उनका लेख ‘अगर घाघरे में जूँ पड़ जाए तो घाघरा नहीं फेंकते’ पढ़ सकते हैं : –  

मैं बार – बार लिखता रहता हूँ और जिनसे भी मिलता हूँ, उनको भी कहता हूँ कि अगर आपके पास एक सौ वर्ग फीट भी खेती की जमीन है, तो उसे बेचिए मत. आज आपको काफी कुछ लग सकता है, जैसे : –

1. खेती तो घाटे का सौदा है !

2. जमीन तो उपजाऊ नहीं है, रख कर क्या करूँगा ?

3. खेती तो बहुत मेहनत का काम है । मैं ना तो खेती कर सकता हूँ और ना करा सकता हूँ ।

4.  जमीन का अच्छा पैसा मिल  रहा है, मैं इसे बैंक में जमा करवा दूँगा या शेयर बाजार में लगा दूँगा । उस से अच्छा रिटर्न आएगा, बैठे-बैठे खाऊँगा ।

5. जमीन बेच कर बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाऊंगा । वे बहुत कमा लेंगे।

ये आपकी खामख़याली हैं। चलिए जरा विस्तार से इन सवालों का जवाब ढूँढ़ते हैं…

  • यह ठीक है कि सरकार की नीतियाँ किसानों के खिलाफ़ हैं तथा बीच-बीच में उसे घाटा होता रहता है, लेकिन खेती अगर लगातार घाटे का सौदा होता तो इससे हजारों सालों से करोड़ों परिवार कैसे पल रहे होते ? उनके वहाँ सब कुछ तो होता है, खाना पीना, शिक्षा, बीमार का ईलाज, उत्सव, शादी । उनकी जमीन की मात्रा, उपजाऊपन, मेहनत और बुद्धिमता के अनुसार उनके पास कच्चे घर से ले कर कोठियाँ और कारें भी हैं। अगर खेती घाटे का सौदा होता तो दुनिया भर में हर साल लाखों करोड़ों एकड़ जमीन ठेके पर नहीं उठ रही होती।
  • अगर जमीन एक फसल के लिए उपजाऊ नहीं है, तो दूसरी के लिए उपजाऊ होगी, उसे उपजाऊ बनाने का कोई उपाय होगा ? अगर आप सारे उपाय कर के निराश हो चुके हैं या बिना उपाय किये ही निराशा हो चुके तो कोई बात नहीं; बेच दीजिए, लेकिन उसकी जगह उपजाऊ जमीन ले लीजिए, भले ही वह पहली की तुलना में बहुत कम हो।
  • सही है कि खेती करना तो बहुत मुश्किल काम है ही, करवाना भी मुश्किल काम है । इसमें बहुत अनिश्चितता भी है। खुद, मेरे खेत में एक जगह पर तीन-तीन बार पेड़ मर चुके हैं, कई बार तो पाँच छः साल के हो कर। लेकिन पंजाबी में कहावत हैं कि अगर घाघरे में जूँ पड़ जाए तो घाघरा नहीं फेंकते।
  • बहुत से इलाकों में खेत वार्षिक ठेके पर उठ जाते हैं। बहुत से लोग भूमिहीन हैं, वे ‘बटाई’ (बँटाई) पर खेती करने को तैयार हैं। आप खुद भी खेती करवा सकते हैं, अगर इच्छा शक्ति हो तो दूर रह कर भी और नौकरी करते हुए भी। पिताजी के देहांत के बाद मैंने  2000 किलोमीटर दूर रह कर अपनी राजस्थान वाली जमीन भी संभाली और 14 साल तक बंगाल वाली जमीन भी पोस्टिंग वाली जगह से 700 किलोमीटर दूर रह कर संभाली है। ना सिर्फ खेती करवाई बल्कि की भी।
  • जमीन  बेच कर बैंक या शेयर बाज़ार से कमाई खाना एक खामख्याली है। ब्याज के मामले में मुद्रा स्फीति इतनी बढ़ रही है कि ब्याज मिला कर भी आपके जमा पैसे की कीमत घट रही है। शेयर बाज़ार तो शुद्ध जुआ है। आप कब लुट जाएँ, नहीं पता। बड़े-बड़े एक्सपर्ट लुट गए, आप किस बाग की मूली हो?
  • जमीन बेच कर बच्चों को शिक्षा दिलवा कर उनसे गुलामी यानी नौकरी करवाओगे, जबकि जमीन रहते ना सिर्फ आप आज़ाद रह सकते हों बल्कि अन्य लोगों को सहारा और नौकरी भी दे सकते हो । ध्यान रहे कि वो आपसे दूर चले जाएँगे। शिक्षा जरूर दिलवाइये, लेकिन जमीन बेच कर नहीं और ना शिक्षित हो कर जमीन बेचने की सोचिए। ध्यान रहे कि जमीन पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होगी, उसकी कीमत बढ़ेगी, लेकिन नौकरी नहीं होगी। हर बार नया कुआँ खोदना है नौकरी।

खेती की ही क्यों, आपके पास किसी भी प्रकार की जमीन है, उसे मत बेचिए, दुनिया में आज तक का सारा झगड़ा जमीन का रहा है, व्यक्ति से ले कर परिवार, समाज और पूरी दुनिया में। धर्म और राष्ट्रवाद तो उसे ढकने के बहाने रहे हैं। अंग्रेज यहाँ जमीन पर कब्जा करने ही आए थे। और आज ट्रम्प और पुतिन भी जमीन के लिए ही लड़ रहे हैं। जमीन पर सिर्फ खेती ही नहीं होती, निवास भी उसी पर होता है और व्यवसाय भी, उद्योग भी और दफ्तर भी।

आज जिसे वर्चुअल कमाई कहा जाता है, उसका भी एक दफ्तर होता है । उनको भी अपने कंप्यूटर और सर्वर कहीं रखने होते हैं । खुद कहीं बैठना होता है । उन फोनों और कंप्यूटरों को बनाने के लिए सामान किसी जमीन से ही निकलता है। खेती और जमीन को नीची नज़र से देखने वालों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि आज भी खाना जमीन पर ही उगता है, इंटरनेट से डाउनलोड नहीं होता।

विशेष : उपर्युक्त लेख महेंद्र सिंह की सहमति से उनकी फेसबुक से लिया गया है. उपयोग की गई तस्वीरें भी उन्हीं की फेसबुक से ली गई है. ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं.

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अनशन करके सरकारों को झुकाना सौ साल पुराना तरीका है

सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके को किसान आंदोलन का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। ज़ब तक कोई आंदोलन ‘अस्तित्व’ और ‘प्राण’ बचाने की प्रेरणा से सम्पन्न नहीं होता, तब तक वह या तो साजिश का हिस्सा हो सकता है या फिर सरल मूर्खता

अगर सोनम वांगचुक मर भी गए तो क्या भारत की जनता दिल्ली की ओर कूच करेगी? ऐसा नहीं भी हो तो अगले चुनाव में भाजपा को सत्ता से बाहर कर देगी? ऐसा सोचना भी हास्यास्पद है। सबसे दुःखद यह है कि कुछ भाजपा समर्थित और कुछ ‘भयानक लोग’ सोनम वांगचुक के मरने की कामना कर रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है। लाखों में है। ये लोग बिना तनख्वाह के वैचारिक गुलाम हैं।

सोनम राजनेता नहीं है। ओमी वैद्य की भाषा में सोनम वांग चुक ‘रोचक ‘ हो सकते हैं, राजनेता नहीं। गाँधी से तुलना व्यर्थ हैं। गाँधी मंजे हुए और सम्पन्न राजनेता थे। उनकी सरकारों के साथ उठ-बैठ थी। शक्ति केंद्रों के प्रति उनकी समझ स्पष्ट थी। एक तरह से गाँधी का अनशन ‘स्पष्ट जिद’ पर आधारित होता था। गाँधी के समय अनशन आन्दोलन जगत में नया प्रयोग था। शक्ति केंद्रों को किसी के मरने से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन मरने वाले व्यक्ति से प्रभाव पड़ता है। गाँधी के बड़े-बड़े शहरों में बड़े-बड़े अनुयायी थे, जो अंग्रेजी सरकार को प्रभावित करने की ताकत रखते थे।

आज सोनम वांगचुक जिस धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा माँग रहे हैं, उन्हीं का कुछ दिन पहले नयी शिक्षा प्रणाली पर समर्थन करके धन्यवाद कर रहे थे। अगर वे स्वयं को शिक्षाविद् और वैज्ञानिक सोच वाला कहते हैं और दुनिया उनको मानती है तो ‘पेपर लीक’ जैसे मुद्दे पर उनका अनशन पर बैठना अप्रासंगिक है क्योंकि CJP की टीम के पास कोई रोडमेप नहीं है। वे स्वयं को CJP के बैनर तले मूल्यहीन ही साबित कर रहे हैं। CJP का ऑनलाइन व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक आंदोलन भविष्य में होने वाले आंदोलनों की भूमिका थी। हो सकता है आगे जाकर बड़ा रूप ले लेता?अगर अभिजीत दिपके और उसके साथियों में ईमानदारी है भी तो उनके पास आंदोलन का कोई ‘प्लान’ नहीं होने के कारण दिल्ली में ‘जंतर-मंतर’ पर भीड़ जुटाना उनके लिए असंभव है क्योंकि ‘अन्ना आंदोलन’ ने कुछ समझदार और आशावादी लोगों के विश्वास को हमेशा के लिए नष्ट कर दिया।

भारत की मध्यमवर्गीय जनता को आंदोलन करना फिलहाल नहीं आता। न उनकी वैचारिक समझ स्पष्ट है और न ही वे आंदोलन करके व्यवस्था बदलने जैसे ख्वाब देखते हैं। अंग्रेजी शासन से मुक्ति का आंदोलन इतिहास लेखन की चालाकी है जिसको ‘आजादी का आंदोलन’ कहा गया है। जिसे आंदोलन कहकर पाठ्य क्रमों में पढ़ाया जाता है और संविधान कहकर ‘न्याय-न्याय’ की गुहार लगाई जाती है, उसमें अधिकांश जनसंख्या का कोई योगदान और भागीदारी नहीं थी। यही कारण है कि आज सोनम वांगचुक जनता को यह बात समझाने में असफल हैं कि वे उन्हीं के लिए अपनी जान देने को तैयार हैं।

जिन लोगों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान दी वे पढ़े लिखें और ‘व्यवस्था का मतलब’ समझने वाले लोग थे। गाँधी, भगतसिंह, आंबेडकर, नेहरू इत्यादि राजनेता पहले थे, आंदोलनकारी बाद में। अनशन करके सरकारों को झुकाना सौ साल पुराना तरीका है। अन्ना आंदोलन प्रायोजित और ‘मीडिया मैंनेजमेंट’ था। सोनम वांगचुक और अभिजीत दिपके को किसान आंदोलन का गंभीर अध्ययन करना चाहिए। सत्ताओं का चरित्र बदल गया लेकिन आंदोलन अभी भी उसी घिसे-पीटे तरीके से हो रहे हैं। ज़ब तक कोई आंदोलन ‘अस्तित्व’ और ‘प्राण’ बचाने की प्रेरणा से सम्पन्न नहीं होता तब तक वह या तो साजिश का हिस्सा हो सकता है या फिर सरल मूर्खता।

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जंतर मंतर जहाँ तमिलनाडु के किसानों का नग्न प्रदर्शन भी व्यवस्था की नजर में अपराध बन गया था और कॉकरोच जनता पार्टी…?

हाल ही में CJI द्वारा बेरोजगारों को कॉकरोच कहने की प्रतिक्रिया स्वरूप सोशल मीडिया पर बनी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का 6 जून को दिल्ली के जंतर-मन्तर पर प्रदर्शन हुआ. उसके आयोजकों को लेकर विपक्षी पार्टीयों की राय भी अस्पष्ट ही रही लेकिन देश की न्याय व्यवस्था के सर्वोतम शिखर पर बैठे व्यक्ति के गैर-जिम्मेदाराना और अनैतिक बयानों की प्रतिक्रिया स्वरूप देश का युवा चाहे ऑनलाइन ही एक हुआ हो, कम से कम विरोध में तो बोला. CJP के सम्बन्ध में हिंदी क्षेत्र के आलोचकों ने क्या-क्या प्रतिक्रिया दी है…नीचे पढिए.

वैभव सिंह

काक्रोच जनता पार्टी एक अराजक हो चुके सिस्टम के खिलाफ़ अराजक प्रतिक्रिया है। इस आंदोलन के सफल होने की खास उम्मीद नहीं है। स्वाभाविक है कि यह सिस्टम की मजबूत चट्टान के आगे धराशायी हो जाएगा, या पूरी तरह उसका ही अंग बन जाएगा। पर देश में बढ़ते चौतरफा नियंत्रण, संस्थाओं पर आरएसएस के मलिन कब्जे और सेंसरशिप को चुनौती देकर यह युवाओं को भविष्य के किसी अधिक बड़े मूवमेंट की तैयारी की प्रेरणा भी दे सकता है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वतःस्फूर्त किस्म की डिजिटल एकजुटता को जमीनी यथार्थ में बदलने का काम पिछले एक दशक में भाजपा-संघ ने बखूबी किया है। संभव है कि उसका विरोध भी इसी प्रक्रिया से निकलकर सामने आएगा।

उमाशंकर सिंह परमार

भारत मे कोई भी आन्दोलन हो कितनी भी सावधानी रखी जाये शुरूआत मे ही किसी न किसी असफल , राजनीति से चुके हुए , झूठे नैरेटिवबाज़ पेशेवर हैकरों द्वारा हाईजैक कर लिया जाता है फिर चलता है, घिसटता है फिर लुढकता है, अन्त मे बिना किसी उम्मीद के पिटता है ।

अन्ना आन्दोलन मेरी स्मृति मे सबसे बडा जनान्दोलन था अन्नाटीम ने शुरुआत मे सावधानी रखी लेकिन अन्ततः हाईजैक होकर पिट गया अब कोई जनलोकपाल, राईट टू रिकाल की माँग नही करता है ।

काक्रोच आन्दोलन का यह पहला प्रदर्शन था मगर यह भी हाईजैक हो गया बदनाम नारे, बदनाम लोग, बदनाम पेड मीडिया ने और नेताओं ने इसकी दिशा और दशा तय कर दी । जो कुछ कमी रही मीडिया बाईट मे बोलते टुकडे-टुकडे गैंग के टुकडाखोर लोगों की बयानबाजी ने पूरी कर दी ।

पहला जमवाडा था बहुत से लोग मात्र तमाशा देखने गये थे। आन्दोलनकारियों से ज्यादा पुलिस की उपस्थिति रही ,और उनसे थोडा कम मीडिया की उपस्थिति रही ।

आशुतोष कुमार

अगर किसी को लगता है कि हज़ारों युवाओं का जंतर मंतर पर जुटना सी. आई. ए. या आर. एस. एस. की साजिश है, तो वह जरूर यह सोचता होगा कि भारत के युवा दुख और आक्रोश से ऊपर उठ चुके हैं।

सोचता होगा कि करोड़ों नौजवानों की जवानी को लील रही बेरोजगारी से उन्हें कोई कष्ट नहीं है। पेपर लीक से कोई परेशानी नहीं है। रिश्वत के बदले नौकरी परियोजना से वे प्रसन्न हैं। हिंदू मुसलमान की बकवास उनके हर दुख की दवा है। वे इतनी गर्मी और धूप में, बिना किसी साजिश के, सड़क पर आ ही नहीं सकते।

अगर किसी को लगता है कि कॉक्रोच प्रोटेस्ट से फासीवाद समाप्त हो जाएगा और पूरे देश में क्रांति फैल जाएगी तो जरूर वह सोचता होगा कि क्रांति बस सर्वोच्च न्याय- देवता के ऐतिहासिक बयान का इंतज़ार कर रही थी! आपको कुछ नहीं करना है। बस तमाशा देखना है और एक्सपर्ट कमेंट झोंकते रहना है।

अगर आप इन दो श्रेणियों में नहीं हैं, आपको लगता है कि नौजवानों का गुस्सा वास्तविक और जेनुइन है, तो आप उनके बीच जाएंगे और उस आक्रोश को एक राजनीतिक दिशा देने की कोशिश करेंगे। आइसा और दूसरे वाम संगठनों के युवा साथी यही कर रहे हैं। ठीक कर रहे हैं। पसीना बहाने का समय है, बहा रहे हैं। बिना लड़े हार जाने से लड़ कर हार जाना अच्छा है, अगर हारना ही है।

अगर दमन नहीं हुआ तो इसका मतलब यह मत लगाइए कि मिलीभगत है। सरकार अपना अच्छा बुरा समझती है। कल दमन हो जाता तो आज देश भर में जंतर मंतर खड़े हो जाते। अभी सुरक्षित दूरी पर रहना सरकार के लिए भी सबसे अधिक सुरक्षित है। दमन के लिए वह भी कॉकरोचों की किसी गलती का इंतजार करेगी।

वैसे कॉक्रोच भी सतर्क हैं। आंबेडकर, गाँधी और भगत सिंह को कलेजे से लगाए खड़े हैं। अगर वे इसी तरह फूलों और कविताओं के साथ शांतिपूर्ण ढंग से आगे बढ़ते रहे तो कम से कम हिंदू मुसलमान की राजनीति तो ख़त्म कर देंगे। इतना भी हो जाए तो बहुत बड़ा बदलाव हो जाएगा।

सुभाष चन्द्र कुशवाहा

यह वही जंतर-मंतर है, जहाँ शांतिपूर्ण विरोध के लिए पहुँचे तमिलनाडु के किसानों का नग्न प्रदर्शन भी व्यवस्था की नजर में अपराध बन गया था। महीनों तक चले उनके आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया गया। यही वह जंतर-मंतर है जहाँ देश की शीर्ष महिला पहलवानों को सड़क पर घसीटा गया, हिरासत में लिया गया और उन पर मुकदमे दर्ज हुए। यही वह जगह है जहाँ किसानों को पहुँचने से रोका गया, छात्रों और पुरानी पेंशन की माँग करने वाले कर्मचारियों के आंदोलनों पर कड़ी निगरानी रखी गई।

लेकिन यही जंतर-मंतर तब सहज उपलब्ध हो जाता है जब कोई स्वयंभू ‘मसीहा’ विदेश से दिल्ली पहुँचकर कुछ ही घंटों में पुलिस सुरक्षा और प्रशासनिक अनुमति के साथ मंच पर खड़ा हो जाता है और बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर आगे रखकर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की माँग करता है।

बाबा साहब की तस्वीर लगाने मात्र से कोई व्यक्ति या संगठन उनकी विचारधारा का प्रतिनिधि नहीं बन जाता। बाबा साहब का नाम लेना और उनके सामाजिक न्याय, समानता, वैज्ञानिक सोच तथा लोकतांत्रिक संघर्ष के मूल्यों को आत्मसात करना दो अलग बातें हैं।

छात्रों का आक्रोश केवल परीक्षा घोटालों या नीट जैसी घटनाओं तक सीमित नहीं है। यह उस मानसिकता के विरुद्ध भी है जो युवाओं, बेरोजगारों और असहमति रखने वालों को अपमानित करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल किसी मंत्री के इस्तीफे की माँग से यह संघर्ष समाप्त हो जाएगा? क्या इससे युवाओं की बेरोजगारी दूर हो जाएगी? क्या इससे शिक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक समस्याएँ खत्म हो जाएँगी? क्या इससे सांप्रदायिक नफरत, हिंसा, दमन और लोकतांत्रिक अधिकारों पर हो रहे हमले रुक जाएँगे?

इतिहास बताता है कि लोकतांत्रिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति, एक चेहरे या एक दिन के कार्यक्रम से नहीं आते। वे व्यापक सामाजिक भागीदारी, संगठन, विचार और दीर्घकालिक संघर्ष से आते हैं। किसी भी आंदोलन की वास्तविक शक्ति उसके संगठन, उसकी सामूहिक नेतृत्व क्षमता और उसके स्पष्ट सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम में होती है, न कि किसी एक व्यक्ति की लोकप्रियता में।

बाबा साहब अंबेडकर की विचारधारा व्यक्ति-पूजा की नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक संगठन और समान अधिकारों की विचारधारा है। यदि कोई आंदोलन सचमुच उनके विचारों का सम्मान करना चाहता है, तो उसे समाज के हर वंचित, पीड़ित, छात्र, किसान, मजदूर, मुसलमान, सिक्ख और बेरोजगार युवा को साथ लेकर चलना होगा। अन्यथा यह अन्ना हजारे आंदोलन का बी पार्ट साबित होगा।

लोकतंत्र को बचाने का रास्ता रातों-रात नायक गढ़ने में नहीं, बल्कि संगठित जनसंघर्ष और व्यापक सामाजिक एकजुटता में है।

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  1. ऐसे आंदोलन होते रहते है… कुछ समय बाद सब शांत हो जाते है… ऐसे ही आंदोलन से आप पार्टी भी बनी थी

  2. सिर्फ सरकारी नौकरी के भरोसे जीवन न बनाएं नए कौशल, रोजगार और आत्मनिर्भरता

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सरकारी नौकर होने के दम्भ ने किसान समाज का आत्मसम्मान छीन लिया है

हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश या राजस्थान के कुछ नौजवान जिनकी उम्र 20-22 से लेकर 30-32 के आसपास होगी । बढ़ती गर्मी और भयंकर लू में ठंडे प्रदेशों की ओर लाखों लोग हिमाचल, उतराखंड और जम्मू-कश्मीर की तरफ भाग रहे हैं । केवल इस वर्ष की बात नहीं है यह…हर साल ऐसा ही होता है । अबकी बार एक नया ट्रेंड देखने को मिला कि सिगरेट और शराब का सेवन करते हुए लोगों को स्थानीय निवासियों द्वारा पकड़कर पीटना और संस्कृति को खराब करने की दुहाई देना ।

कौन है ये लोग जो अचानक से घूमने की चुल्ल लिए पहाड़ों की ओर दौड़ पड़ते हैं ? इनको कोई काम नहीं है ? इनके पास घूमने का पैसा कहाँ से आता होगा ? ये गर्मियों में ही घूमने क्यों निकलते हैं ? इन लोगों के पास शायद देश और समाज-राजनीति की कोई विशेष समझ भी नहीं है और अगर है भी तो इतनी सतही कि एक दूसरे का सिर फोड़ लें या फिर किसी के बहकावे में आकर किसी नेता, विचार या धार्मिक मत के पीछे हिंसा पर उतारू हो जाएँ । पहाड़ों में जाकर अपनी आग को शांत करने वाले लोगों की भीड़ क्यों बढती चली गई ?

इस भीड़ का निर्माण आज के 20 साल पहले तब होना शुरू हुआ था; जब गाँवों के उजड़ने के आरम्भिक दौर का चरमसुख गाँव के लोगों को मिलने ही लगा था । और तब, जब शिक्षा व्यवस्था में पाठ्क्रमों को नौकरियों के हिसाब से डिजाइन करने के सरकारी प्रयासों की युद्ध स्तर पर शुरुआत और तथाकथित लोकतांत्रिक विकास का झंडा उठाए राजनीतिक पार्टियाँ वैश्विक एजेंडे को भारतीय गाँवों में घुसेड़ने के लिए कमर कस चुकी थी । इन 20 सालों को 10 साल पीछे खिसका देने से इन सबकी भूमिका समझ आने लगेगी ।

पिछले 30 सालों से कूदकर पुन: वर्तमान में लौटकर दिल्ली, इलाहबाद, बनारस, जयपुर, जोधपुर, सीकर और तमाम उतर भारतीय राज्यों के बड़े शहरों के कोचिंग संस्थानों की भीड़ की ओर लौटते हैं । जहाँ पाँच सौ से कम पदों की सरकारी भर्ती के लिए लाखों अभ्यर्थी पाठ्यक्रमों को रटने में लगे हुए हैं । ये करोड़ों नौजवान कहाँ से आये हैं ? ये भारत के गाँवों से आये हुए नौजवान है, जिन्होंने पिछले बीस सालों में बेरोजगार होने की ट्रेनिंग ली है – विद्यालयों और विश्वविद्यालयों से । विद्यालयों ने इनको सिखाया कि बड़े होकर बड़ा सरकारी नौकर बनना है और विश्वविद्यालयों ने नौकर बनने की प्रक्रिया में उत्कृष्ट प्रतिभागी होने की कला सिखायी । कम से कम पिछले 10 सालों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले 80 प्रतिशत अभ्यर्थी या तो अभी भी तैयारी ही कर रहे हैं या फिर वे वापस गाँव न लौट सके तो कोर्पोरेट मजदूर बन गए या फिर नशे की लत के कारण मजदूर बनने को मजबूर हैं या फिर गाँव लौटकर अकेलेपन की जिंदगी गुजार रहे हैं । (इनमें से अधिकांश शहरों में तैयारी करने ही इसलिए आये थे ताकि विवाह हो जाए । दरअसल गाँवों में नौकरी और विवाह का गहरा अंतर्संबंध है । सरकारी नौकरियों को कुरीतियों में शामिल किया जाना चाहिए है ।)     

जिन्होंने बैचलर और मास्टर्स की डिग्री कर ली और कई सालों से प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं हो रहे हैं । वे इस भीड़ का हिस्सा है, जो कभी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनकर क्रांति कर देने का भ्रम देते हैं तो कभी कावड़िया बनकर अराजकता फैलाते हुए पाए जाते हैं । इनके जीवन में शांति और उल्लास के नाम पर घर के घुटन और चिंता के माहौल से दूर जाकर शराब इत्यादि का सेवन करना ही शेष बचा है ।

‘सबको सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती’ इस सत्य को ये युवा शहर आये हैं, तब से जानते हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन सरकारों ने इनको डिग्रियाँ दी है, वे इनके इस भ्रम को मिटने क्यों नहीं देती? क्यों नहीं कहती कि सरकारी नौकरी सबके लिए नहीं है? क्यों इन्होने किसानों और मजदूरों के बच्चों को बर्बाद किया? क्यों वे कोचिंग संस्थानों के भड़कीले विज्ञापनों के खिलाफ कार्यवाही नहीं करती? क्यों किसी की सरकारी नौकरी लगना समाज में किसी त्यौहार की तरह मनाया जाता है? सरकारी नौकर होने के दम्भ ने किसानी समाज का आत्मसम्मान छीन लिया है ।  

सरकारी नौकरी और ब्याह के चक्कर में बर्बादी की राह पर किसानों और मजदूरों की दूसरी पीढ़ी भी चल पड़ी है । जिनको Gen Z कहा जा रहा है – वे शहरों और खासकर गाँवों के युवाओं को गुमराह करने का एक तन्त्र है । (शहर में पले बढ़े बच्चों के पास धरोहर के नाम पर कुछ ख़ास नहीं होता । किताबी ज्ञान ही उनके लिए सब कुछ है) गाँव का युवा इस चक्कर में केवल रील स्क्राल तक ही सीमित है । यह दूसरी पीढ़ी भी जो अक्षर ज्ञानी होने के साथ तकनीक के साथ बड़ी हुई है – अधकचरे ज्ञान के साथ तेज गति से बढ़ती व्यवस्था में दिहाड़ी मजदूर बनने की ओर बढ़ रही है । इसके पहली वाली पीढ़ी ने खेती करना छोड़ा था, यह भूल ही जाएँगे ।   

एक निजी और मोटे अनुमान के अनुसार केवल 30 प्रतिशत परिवार ही अपने बच्चों की शादी सही समय या बाद में कर पाते हैं । यह समस्या 21 वीं सदी के दूसरे दशक में जाकर नजर आयी, जिसके समाधान के लिए गाँव के परिवारों ने अपने बच्चों को नौकरियों के दलदल में धकेल दिया । अभी भी 80 से 90 प्रतिशत परिवार यही सोचते हैं कि लड़का या लड़की नौकरी लग जाएगा तो ही शादी होगी। (लड़कियों के बारें में 2 प्रतिशत ग्रामीण परिवार ही सोचते हैं क्योंकि शादी और नौकरी की समस्या का संबंध मूल रूप से लड़कों से है) गाँवों में जिस पीढ़ी का जन्म 20 वीं सदी के अंतिम दशक में हुआ, उनके लिए भारतीय शिक्षा पद्धति न वरदान बन पायी और न अभिशाप। वे शिक्षा व्यवस्था द्वारा ऐसी शापित पीढ़ी है जिसको तकनीक और परम्परागत ज्ञान के बीच अपने निजी जीवन में पीसने और असफल होने का वरदान मिला है ।

अभी भी समय है कि गाँवों को छोड़ने के बजाय खेती में ही स्वयं को खपाए और उन्नत तकनीकों के सहारे और बाजारवादी व्यवस्था के हिसाब से अपनी पैदावार के विक्रेता खुद ही बन जाए ।  

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  1. सही बात छ….आ ही हालत हो रही छ….. नौकरी क चक्कर में 10 -10 निकल गी… ना नौकरी मिली ना छोकरी

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