सरकारी नौकर होने के दम्भ ने किसान समाज का आत्मसम्मान छीन लिया है

हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश या राजस्थान के कुछ नौजवान जिनकी उम्र 20-22 से लेकर 30-32 के आसपास होगी । बढ़ती गर्मी और भयंकर लू में ठंडे प्रदेशों की ओर लाखों लोग हिमाचल, उतराखंड और जम्मू-कश्मीर की तरफ भाग रहे हैं । केवल इस वर्ष की बात नहीं है यह…हर साल ऐसा ही होता है । अबकी बार एक नया ट्रेंड देखने को मिला कि सिगरेट और शराब का सेवन करते हुए लोगों को स्थानीय निवासियों द्वारा पकड़कर पीटना और संस्कृति को खराब करने की दुहाई देना ।

कौन है ये लोग जो अचानक से घूमने की चुल्ल लिए पहाड़ों की ओर दौड़ पड़ते हैं ? इनको कोई काम नहीं है ? इनके पास घूमने का पैसा कहाँ से आता होगा ? ये गर्मियों में ही घूमने क्यों निकलते हैं ? इन लोगों के पास शायद देश और समाज-राजनीति की कोई विशेष समझ भी नहीं है और अगर है भी तो इतनी सतही कि एक दूसरे का सिर फोड़ लें या फिर किसी के बहकावे में आकर किसी नेता, विचार या धार्मिक मत के पीछे हिंसा पर उतारू हो जाएँ । पहाड़ों में जाकर अपनी आग को शांत करने वाले लोगों की भीड़ क्यों बढती चली गई ?

इस भीड़ का निर्माण आज के 20 साल पहले तब होना शुरू हुआ था; जब गाँवों के उजड़ने के आरम्भिक दौर का चरमसुख गाँव के लोगों को मिलने ही लगा था । और तब, जब शिक्षा व्यवस्था में पाठ्क्रमों को नौकरियों के हिसाब से डिजाइन करने के सरकारी प्रयासों की युद्ध स्तर पर शुरुआत और तथाकथित लोकतांत्रिक विकास का झंडा उठाए राजनीतिक पार्टियाँ वैश्विक एजेंडे को भारतीय गाँवों में घुसेड़ने के लिए कमर कस चुकी थी । इन 20 सालों को 10 साल पीछे खिसका देने से इन सबकी भूमिका समझ आने लगेगी ।

पिछले 30 सालों से कूदकर पुन: वर्तमान में लौटकर दिल्ली, इलाहबाद, बनारस, जयपुर, जोधपुर, सीकर और तमाम उतर भारतीय राज्यों के बड़े शहरों के कोचिंग संस्थानों की भीड़ की ओर लौटते हैं । जहाँ पाँच सौ से कम पदों की सरकारी भर्ती के लिए लाखों अभ्यर्थी पाठ्यक्रमों को रटने में लगे हुए हैं । ये करोड़ों नौजवान कहाँ से आये हैं ? ये भारत के गाँवों से आये हुए नौजवान है, जिन्होंने पिछले बीस सालों में बेरोजगार होने की ट्रेनिंग ली है – विद्यालयों और विश्वविद्यालयों से । विद्यालयों ने इनको सिखाया कि बड़े होकर बड़ा सरकारी नौकर बनना है और विश्वविद्यालयों ने नौकर बनने की प्रक्रिया में उत्कृष्ट प्रतिभागी होने की कला सिखायी । कम से कम पिछले 10 सालों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले 80 प्रतिशत अभ्यर्थी या तो अभी भी तैयारी ही कर रहे हैं या फिर वे वापस गाँव न लौट सके तो कोर्पोरेट मजदूर बन गए या फिर नशे की लत के कारण मजदूर बनने को मजबूर हैं या फिर गाँव लौटकर अकेलेपन की जिंदगी गुजार रहे हैं । (इनमें से अधिकांश शहरों में तैयारी करने ही इसलिए आये थे ताकि विवाह हो जाए । दरअसल गाँवों में नौकरी और विवाह का गहरा अंतर्संबंध है । सरकारी नौकरियों को कुरीतियों में शामिल किया जाना चाहिए है ।)     

जिन्होंने बैचलर और मास्टर्स की डिग्री कर ली और कई सालों से प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल नहीं हो रहे हैं । वे इस भीड़ का हिस्सा है, जो कभी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ बनकर क्रांति कर देने का भ्रम देते हैं तो कभी कावड़िया बनकर अराजकता फैलाते हुए पाए जाते हैं । इनके जीवन में शांति और उल्लास के नाम पर घर के घुटन और चिंता के माहौल से दूर जाकर शराब इत्यादि का सेवन करना ही शेष बचा है ।

‘सबको सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती’ इस सत्य को ये युवा शहर आये हैं, तब से जानते हैं लेकिन हैरानी की बात यह है कि जिन सरकारों ने इनको डिग्रियाँ दी है, वे इनके इस भ्रम को मिटने क्यों नहीं देती? क्यों नहीं कहती कि सरकारी नौकरी सबके लिए नहीं है? क्यों इन्होने किसानों और मजदूरों के बच्चों को बर्बाद किया? क्यों वे कोचिंग संस्थानों के भड़कीले विज्ञापनों के खिलाफ कार्यवाही नहीं करती? क्यों किसी की सरकारी नौकरी लगना समाज में किसी त्यौहार की तरह मनाया जाता है? सरकारी नौकर होने के दम्भ ने किसानी समाज का आत्मसम्मान छीन लिया है ।  

सरकारी नौकरी और ब्याह के चक्कर में बर्बादी की राह पर किसानों और मजदूरों की दूसरी पीढ़ी भी चल पड़ी है । जिनको Gen Z कहा जा रहा है – वे शहरों और खासकर गाँवों के युवाओं को गुमराह करने का एक तन्त्र है । (शहर में पले बढ़े बच्चों के पास धरोहर के नाम पर कुछ ख़ास नहीं होता । किताबी ज्ञान ही उनके लिए सब कुछ है) गाँव का युवा इस चक्कर में केवल रील स्क्राल तक ही सीमित है । यह दूसरी पीढ़ी भी जो अक्षर ज्ञानी होने के साथ तकनीक के साथ बड़ी हुई है – अधकचरे ज्ञान के साथ तेज गति से बढ़ती व्यवस्था में दिहाड़ी मजदूर बनने की ओर बढ़ रही है । इसके पहली वाली पीढ़ी ने खेती करना छोड़ा था, यह भूल ही जाएँगे ।   

एक निजी और मोटे अनुमान के अनुसार केवल 30 प्रतिशत परिवार ही अपने बच्चों की शादी सही समय या बाद में कर पाते हैं । यह समस्या 21 वीं सदी के दूसरे दशक में जाकर नजर आयी, जिसके समाधान के लिए गाँव के परिवारों ने अपने बच्चों को नौकरियों के दलदल में धकेल दिया । अभी भी 80 से 90 प्रतिशत परिवार यही सोचते हैं कि लड़का या लड़की नौकरी लग जाएगा तो ही शादी होगी। (लड़कियों के बारें में 2 प्रतिशत ग्रामीण परिवार ही सोचते हैं क्योंकि शादी और नौकरी की समस्या का संबंध मूल रूप से लड़कों से है) गाँवों में जिस पीढ़ी का जन्म 20 वीं सदी के अंतिम दशक में हुआ, उनके लिए भारतीय शिक्षा पद्धति न वरदान बन पायी और न अभिशाप। वे शिक्षा व्यवस्था द्वारा ऐसी शापित पीढ़ी है जिसको तकनीक और परम्परागत ज्ञान के बीच अपने निजी जीवन में पीसने और असफल होने का वरदान मिला है ।

अभी भी समय है कि गाँवों को छोड़ने के बजाय खेती में ही स्वयं को खपाए और उन्नत तकनीकों के सहारे और बाजारवादी व्यवस्था के हिसाब से अपनी पैदावार के विक्रेता खुद ही बन जाए ।  

2 thoughts on “सरकारी नौकर होने के दम्भ ने किसान समाज का आत्मसम्मान छीन लिया है

  1. सही बात छ….आ ही हालत हो रही छ….. नौकरी क चक्कर में 10 -10 निकल गी… ना नौकरी मिली ना छोकरी

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