महेंद्र सिंह भारतीय पुलिस सेवा से निवृत किसान व्यवसायी हैं । वर्तमान में पश्चिमी बंगाल में रहकर खेती करते हैं और सोशल मीडिया पर खेती, खानपान तथा समसामयिक मुद्दों पर खुलकर लिखते हैं । यहाँ आप प्रशनोंत्तर शैली में उनका लेख ‘अगर घाघरे में जूँ पड़ जाए तो घाघरा नहीं फेंकते’ पढ़ सकते हैं : –

मैं बार – बार लिखता रहता हूँ और जिनसे भी मिलता हूँ, उनको भी कहता हूँ कि अगर आपके पास एक सौ वर्ग फीट भी खेती की जमीन है, तो उसे बेचिए मत. आज आपको काफी कुछ लग सकता है, जैसे : –
1. खेती तो घाटे का सौदा है !
2. जमीन तो उपजाऊ नहीं है, रख कर क्या करूँगा ?
3. खेती तो बहुत मेहनत का काम है । मैं ना तो खेती कर सकता हूँ और ना करा सकता हूँ ।
4. जमीन का अच्छा पैसा मिल रहा है, मैं इसे बैंक में जमा करवा दूँगा या शेयर बाजार में लगा दूँगा । उस से अच्छा रिटर्न आएगा, बैठे-बैठे खाऊँगा ।
5. जमीन बेच कर बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाऊंगा । वे बहुत कमा लेंगे।
ये आपकी खामख़याली हैं। चलिए जरा विस्तार से इन सवालों का जवाब ढूँढ़ते हैं…

- यह ठीक है कि सरकार की नीतियाँ किसानों के खिलाफ़ हैं तथा बीच-बीच में उसे घाटा होता रहता है, लेकिन खेती अगर लगातार घाटे का सौदा होता तो इससे हजारों सालों से करोड़ों परिवार कैसे पल रहे होते ? उनके वहाँ सब कुछ तो होता है, खाना पीना, शिक्षा, बीमार का ईलाज, उत्सव, शादी । उनकी जमीन की मात्रा, उपजाऊपन, मेहनत और बुद्धिमता के अनुसार उनके पास कच्चे घर से ले कर कोठियाँ और कारें भी हैं। अगर खेती घाटे का सौदा होता तो दुनिया भर में हर साल लाखों करोड़ों एकड़ जमीन ठेके पर नहीं उठ रही होती।
- अगर जमीन एक फसल के लिए उपजाऊ नहीं है, तो दूसरी के लिए उपजाऊ होगी, उसे उपजाऊ बनाने का कोई उपाय होगा ? अगर आप सारे उपाय कर के निराश हो चुके हैं या बिना उपाय किये ही निराशा हो चुके तो कोई बात नहीं; बेच दीजिए, लेकिन उसकी जगह उपजाऊ जमीन ले लीजिए, भले ही वह पहली की तुलना में बहुत कम हो।
- सही है कि खेती करना तो बहुत मुश्किल काम है ही, करवाना भी मुश्किल काम है । इसमें बहुत अनिश्चितता भी है। खुद, मेरे खेत में एक जगह पर तीन-तीन बार पेड़ मर चुके हैं, कई बार तो पाँच छः साल के हो कर। लेकिन पंजाबी में कहावत हैं कि अगर घाघरे में जूँ पड़ जाए तो घाघरा नहीं फेंकते।
- बहुत से इलाकों में खेत वार्षिक ठेके पर उठ जाते हैं। बहुत से लोग भूमिहीन हैं, वे ‘बटाई’ (बँटाई) पर खेती करने को तैयार हैं। आप खुद भी खेती करवा सकते हैं, अगर इच्छा शक्ति हो तो दूर रह कर भी और नौकरी करते हुए भी। पिताजी के देहांत के बाद मैंने 2000 किलोमीटर दूर रह कर अपनी राजस्थान वाली जमीन भी संभाली और 14 साल तक बंगाल वाली जमीन भी पोस्टिंग वाली जगह से 700 किलोमीटर दूर रह कर संभाली है। ना सिर्फ खेती करवाई बल्कि की भी।
- जमीन बेच कर बैंक या शेयर बाज़ार से कमाई खाना एक खामख्याली है। ब्याज के मामले में मुद्रा स्फीति इतनी बढ़ रही है कि ब्याज मिला कर भी आपके जमा पैसे की कीमत घट रही है। शेयर बाज़ार तो शुद्ध जुआ है। आप कब लुट जाएँ, नहीं पता। बड़े-बड़े एक्सपर्ट लुट गए, आप किस बाग की मूली हो?
- जमीन बेच कर बच्चों को शिक्षा दिलवा कर उनसे गुलामी यानी नौकरी करवाओगे, जबकि जमीन रहते ना सिर्फ आप आज़ाद रह सकते हों बल्कि अन्य लोगों को सहारा और नौकरी भी दे सकते हो । ध्यान रहे कि वो आपसे दूर चले जाएँगे। शिक्षा जरूर दिलवाइये, लेकिन जमीन बेच कर नहीं और ना शिक्षित हो कर जमीन बेचने की सोचिए। ध्यान रहे कि जमीन पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होगी, उसकी कीमत बढ़ेगी, लेकिन नौकरी नहीं होगी। हर बार नया कुआँ खोदना है नौकरी।
खेती की ही क्यों, आपके पास किसी भी प्रकार की जमीन है, उसे मत बेचिए, दुनिया में आज तक का सारा झगड़ा जमीन का रहा है, व्यक्ति से ले कर परिवार, समाज और पूरी दुनिया में। धर्म और राष्ट्रवाद तो उसे ढकने के बहाने रहे हैं। अंग्रेज यहाँ जमीन पर कब्जा करने ही आए थे। और आज ट्रम्प और पुतिन भी जमीन के लिए ही लड़ रहे हैं। जमीन पर सिर्फ खेती ही नहीं होती, निवास भी उसी पर होता है और व्यवसाय भी, उद्योग भी और दफ्तर भी।

आज जिसे वर्चुअल कमाई कहा जाता है, उसका भी एक दफ्तर होता है । उनको भी अपने कंप्यूटर और सर्वर कहीं रखने होते हैं । खुद कहीं बैठना होता है । उन फोनों और कंप्यूटरों को बनाने के लिए सामान किसी जमीन से ही निकलता है। खेती और जमीन को नीची नज़र से देखने वालों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि आज भी खाना जमीन पर ही उगता है, इंटरनेट से डाउनलोड नहीं होता।
विशेष : उपर्युक्त लेख महेंद्र सिंह की सहमति से उनकी फेसबुक से लिया गया है. उपयोग की गई तस्वीरें भी उन्हीं की फेसबुक से ली गई है. ये उनके व्यक्तिगत विचार हैं.











“मैं आपकी बात से सहमत हूँ…..
बिल्कुल सही बात है